September 20, 2026

अनोखे अंदाज़ का अंतराष्ट्रीय कुल्लु का दशहरा

कुल्लू का दशहरा परंपरा, रीतिरिवाज और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है। हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा सबसे अलग और अनोखे अंदाज में मनाया जाता है। यहां इस त्यौहार को दशमी कहते हैं और दस आश्विन मास को इसकी शुरुआत होती है। जब पूरे भारत में विजयादशमी की समाप्ति होती है उस दिन से कुल्लू की घाटी में इस उत्सव का रंग और भी अधिक बढ़ने लगता है। कुल्लु का दशहरा आज अंतराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। इस दशहरे की परम्परा से पता चलता है कि यहां के राजा ऐसे भी हुए जिन्होंने अपनी गद्दी को ही भगवान को समर्पित कर दिया। स्वयं सेवक या छड़ीबरदार बनकर उनकी सेवा में तत्पर हो गये। यह उत्सव प्राचीन परम्परा और नये सामाजिक बदलावों की समाविष्ट संस्कृति का निदर्शन करवाता है। यह प्राचीन संस्कृति पर आधारित है जिसकी वर्तमान जीवन में अपनी प्रासंगिकता है।
रघुनाथ जी कुल्लु के प्रधान देवता के रूप में हुए थे प्रतिष्ठित
कुल्लू में रघुनाथ जी का मंदिर राजा जगतसिंह के शासनकाल की देन है जिनका शासनकाल का समय 1637-62 ई. का है। 1637 ई. में उन्होंने कुल्लू की राजगद्दी को संभाला। एक बार इनके राज्य के एक गांव टिपरी के रहने वाले ब्राह्मण परिवार ने अपने रिश्तेदार ब्राह्मण दुर्गादत की झूठी शिकायत कर दी। शिकायत में दावा किया गया कि ब्राह्मण के पास एक पत्था यानि लगभग एक किलोग्राम सुच्चे मोती हैं। राजा शिकायतकर्ता की बातों में आ गये। बाद में ब्राह्मण ने परिवार सहित आत्मदाह कर दिया था। राजा को अपने किये पर भारी पश्चाताप हुआ। इसके बाद राजा को गंभीर बीमारी हो गयी जिसके कारण वह वैष्णव सम्प्रदाय के सिद्ध महात्मा कृष्णदास पयहारी की शरण में चले गये। महात्मा जी ने उनके रोग का निवारण करके उनको नृसिंह भगवान की मूर्ति प्रदान की। राजा ने अपनी गद्दी पर भगवान नृसिंह को स्थापित किया और स्वयं एक छड़ीबदार के रूप में सेवा करने लगे। राजा को महात्मा ने अवध यानि आज की अयोध्या से त्रेतानाथ मंदिर से श्रीरामचन्द्र तथा सीताजी मूर्तियां लाने को कहा। इन मूर्तियों की विशेषता यह थी कि इन मूर्तियों को श्रीरामचंद्र जी ने स्वयं अश्वमेध यज्ञ के लिए बनवाया था। ये आत्मा के आकार यानि अगुंष्ठ मात्र भारतीय शास्त्रीय प्रमाण की हैं। अयोध्या से मूर्तियों को लाने का काम वैष्णव संत के शिष्य पण्डित दामोदर दास गोसांई को दिया गया। दामोदर दास के बारे में बताया जाता है कि उसके पास एक विशेष सिद्धि थी जिसके द्वारा वह मुंह में कुछ पदार्थ रखकर अदृश्य हो गया और अयोध्या में प्रकट हो गया। वहां वह त्रेतानाथ मंदिर के एक पुजारी का शिष्य बन गया। दामोदर दास ने वहां से मूर्तियों को उठाया और हरिद्वार तक पहुंचा दिया। वहां के पुजारी जोधावर को गुजारे की रकम भिजवाने के बाद दामोदर दास मूर्तियां लेकर कुल्लु की ओर चल पड़ा। इसके बाद राजा ने दामोदर दास का खूब स्वागत किया और अपने सिंहासन पर स्थित नृसिंह भगवान के साथ ही मूर्तियों को स्थापित कर दिया। इस अवसर पर राजा ने बड़े उत्सव का आयोजन किया। राजा को कुष्ठ की बीमारी थी लेकिन प्रतिदिन की पूजा को देखने और चरणामृत के सेवन से राजा रोगमुक्त हो गया। राजा ने अपनी सारी जागीर रघुनाथ जी को अर्पण कर दी और स्वयं सेवक बन गया। मूर्तियां लाने वाले पण्डित दामोदार दास को राजा ने भूईंण यानि भून्तर में मंदिर बनवा दिया तथा चौरासी खार अनाज की पैदावार वाली जमीन मुआफी के रूप में प्रदान कर दी। आज भी इस वंश के पण्डित सालीग्राम गोसांई के घर में यह प्राचीन मंदिर मौजूद है। राजा रघुनाथ के लिए एक टका और एक रूपया प्रतिदिन भेंट करता था। राजा की ओर से 500 की राशि प्रतिवर्ष अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर में पहुंचा दी जाती थी। राजा ने त्रेतानाथ के पुजारी और उसके परिवार को बुलाकर कुल्लु बुलाया और जमीन की मुआफी का ताम्रपत्र प्रदान किया। वैष्णव धर्म के पोषक महात्मा कृष्णदास पयहारी सन्त ने राजा को अपना भक्त बना दिया। उस समय यहां नाथों का बहुत प्रभाव था। लेकिन महात्मा ने घाटी में वैष्णव धर्म का प्रचार किया। इसी समय से ही रघुनाथ जी कुल्लु के प्रधान देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। मूर्तियों के चमत्कार को देखकर कुल्लु के सभी 365 देवी-देवता श्री रघुनाथ जी के दर्शनों को आये। जो आजतक परम्परा का अटूट हिस्सा बना हुआ है।
6 स्थानों पर है कुल्लु दशहरा मनाने की परम्परा
कुल्लु के दशहरे की इन 6 स्थानों में मनाने की परम्परा है 1 मकड़ाहर 2 हरिपुर 3 मणिकर्ण 4 ठाउआ 5 वशिष्ठ और 6 कुल्लू ढालपुर। इन मंदिरों में क?मकड़ाहर का मंदिर टूट गया है इसलिए यहां पर दशहरा बंद हो गया है। ठाउआ में एक दिन का दशहरा उत्सव रह गया है। यहां पर मुरलीधर का मंदिर स्थापित है आश्विन शुक्ल दशमी को सुबह शस्त्र और घोड़ पूजन होता है। इस दिन मंदिर में शालग्राम, हनुमान और गरूढ़ की मूर्तियों रथ की चौकियों में आरूढ़ कर रथ के मोटे-मोटे रस्सों को खींच कर मंदिर की ड्योढ़ी तक लाते हैं। मूर्तियों को रथ से उतार कर मंदिर में लाने के साथ ही दशहरे का समापन हो जाता है। मणिकर्ण में राम और सीताजी की प्रतिष्ठित मूर्तियां बनाकर श्रृंगार करके रथ पर आरूढ़ किया जाता है। जलूस के साथ पार्वती नदी के उंचे स्थान पर पहुंचकर नदी के बांयें किनारे पर छोटे घड़े को रखा जाता है। दूर रखे घड़े को पत्थर से तोड़ने की कोशिश की जाती है। जैसे ही घड़ा टूट जाता है लोग जयश्रीराम का नारा लगाकार हनुमान जी को सम्मानित करते हैं और यात्रा जहां से शुरू होती है वहीं आकर वापिस लौट आती है। हरिपुर में यह उत्सव विजय दशमी से सात दिन तक चलता है लेकिन अब यह केवल पांच दिन तक ही सीमित हो गया है। इसके पीछे कारण यह है कि लोग अंतिम दो दिनों में हरिपुर में सामान खरीदने और दशहरा देखने के लिए कुल्लु चले जाते हैं। मनाली से 3 किलोमीटर दूर वशिष्ठ गांव बसा है। मंदिर में श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की बड़ी मूर्तियां हैं। यहां भी कूल्लू की भांति दशहरा मनाया जाता है।
लोगों को देवताओं से मिलने का प्राप्त होता है अवसर
कुल्लू के दशहरे में आश्विन महीने के पहले 15 दिनों में राजा सभी देवी-देवताओं को ढालपुर घाटी में रघुनाथजी के सम्मान में यज्ञ करने के लिए न्योता देते हैं। 100 से ज्यादा देवी-देवताओं को रंगबिरंगी सजी हुई पालकियों में बैठाया जाता है। इस उत्सव के पहले दिन दशहरे की देवी, मनाली की हिडिंबा कुल्लू आती हैं। राजघराने के सब सदस्य देवी का आशीर्वाद लेने आते हैं। यह उत्सव आज भी क्षेत्रवासियों के लिए अपने देवताओं से मिलने का अभिन्न अवसर है। आयोजन के दौरान देवनृत्य होता है तो श्रद्धालु भी रात-रात उनके इर्दर्गिद नाचते रहते हैं। दिन में देव, गूर के माध्यम से भविष्यवाणी करते हैं। भक्त मनौतियां करते हैं। यहां दैवीय शक्ति के अनुभव होते देखे जा सकते हैं। दशहरा के अंतिम दिन लंका दहन होता है। निश्चित समय पर रथ पर सवार रघुनाथजी, मैदान के निचले हिस्से में नदी के किनारे पर ग्रामीणों द्वारा लकड़ी एकत्र कर निर्मित की सांकेतिक लंका को जलाने जाते हैं। शाही परिवार की कुलदेवी होने के नाते देवी हिडिम्बा भी यहां विराजमान रहती हैं। परम्पराएं ऐसी हैं कि कई देवता व्यास नदी लांघे बिना इस देव समारोह का हिस्सा बनते हैं। एक देवी की माता गांव के साथ एक पेड़ के पास बैठकर दशहरा देखती हैं।

रघुनाथ की भव्य रथ यात्रा में शामिल होंगे प्रधानमंत्री
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा महोत्सव में आज निकलने वाली रथयात्रा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भगवान रघुनाथ जी के दर्शन करने के बाद उनका रथ भी खींचेंगे। कुल्लू दशहरा महोत्सव के इतिहास में पहली बार कोई प्रधानमंत्री रथयात्रा में भाग लेंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी रथ मैदान के अटल सदन से रथयात्रा के दर्शन करेंगे। सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा महोत्सव का शुभारंभ भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा के साथ होगा। इस बीच कुल्लू जिला प्रशासन ने प्रधानमंत्री के दौरे व रथयात्रा की पूरी तैयारी कर ली है। करीब 250 बजंतरी कुल्लू जिले के भुंतर हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों से स्वागत करेंगे। महोत्सव में हजारों लोग भाग लेते हैं। महोत्सव के लिए 332 पंजीकृत देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया गया है। दशहरा महोत्सव का इतिहास 372 साल पुराना है।

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